Monday, August 22, 2011

कभी कभी ....

।। कभि कभि......।।
कभि कभि मेरा मन्
रो रो के जागता है ।
कभि कभि मेरा तन
सो सो के जागता है ।।
अंधेरे है राहे सारे,
आंख बन्द ही भागता है ।
कभि कभि मेरा मन... ।
बादल तारे छिपाए,
गगन झांपता है ।
कभि कभि दिलोमे,
चन्दाभी जागता है ।।
कभि कभि मेरा मन ... ।
समिर सरगम समेटे,
बागोको ढुंढता है ।
कोयल कुहुक डाली,
फूलो पै मुडताहै ।।
कभि कभि मेरा..... ।
नयनन् धुले पडि है ,
आयनाही साफ करता ।
समझ सका न खुदको ,
समझने मे क्यो है डरता ?
कभि कभि मेरा मन ......।
।।माधब।।

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